दीपावली पर घरों को दीयों की रोशनी से सजाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के साथ घर के मुख्य द्वार और पूजा स्थल पर दीपक जलाए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि दीपक प्रकाश, ज्ञान और शुभता का प्रतीक है। यही वजह है कि कई परिवारों में दीपावली की रात पूजा का दीपक बुझने नहीं देने की परंपरा निभाई जाती है। आइए जानते हैं कि इस मान्यता के पीछे क्या धार्मिक महत्व है।
दीपक बुझना क्यों माना जाता है अशुभ?
सनातन धर्म में दीपक को ज्ञान, ऊर्जा और शुभता का प्रतीक माना जाता है। दीपावली पर घर के अलग-अलग हिस्सों में दीपक जलाने का उद्देश्य अंधकार दूर करना और खुशियों का स्वागत करना है। इसी धार्मिक भावना के चलते कई परिवारों में मुख्य पूजा के दीपक को रातभर जलाए रखने की परंपरा है। मान्यता है कि जलता हुआ दीपक घर में सकारात्मकता और मंगल का प्रतीक होता है।
मां लक्ष्मी से क्या है संबंध?
दीपावली की रात मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। भक्त घर के मुख्य द्वार, पूजा स्थल और अन्य स्थानों पर दीपक जलाकर देवी का स्वागत करते हैं। दीपों से जगमगाता घर खुशहाली और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण दीपावली पर दीपक जलाने की परंपरा को विशेष महत्व है।
अखंड दीपक की परंपरा
दीपावली की पूजा के दौरान कई घरों में अखंड दीपक जलाया जाता है। इसे निरंतर आस्था, भक्ति और शुभता का प्रतीक माना जाता है। कुछ परिवारों में यह दीपक पूरी रात जलाया जाता है, जबकि कुछ जगहों पर इसे पूजा के निर्धारित समय तक जलाने की परंपरा है। इसके लिए घी या तिल के तेल का इस्तेमाल किया जा सकता है।
दीपक से मिलता है संदेश
दीपक की लौ अंधकार के बीच आशा और ज्ञान का संदेश देती है। अगर पूजा का दीपक जलाकर रखें, तो उसे सुरक्षित स्थान पर रखें और ज्वलनशील वस्तुओं, पर्दों तथा बच्चों की पहुंच से दूर रखें। सुरक्षा के साथ निभाई गई यह परंपरा दीपावली की रोशनी और आस्था को और खास बनाती है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)
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