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Karwa Chauth 2026 Live Updates: करवा चौथ की पूजा कैसे की जाती है? यहां जानिए संपूर्ण विधि, मंत्र, कथा, आरती, सरगी और चंद्रोदय का समय

Author: Ajay Kumar

Published: 28-10-2026, 8:31 AM

Karwa Chauth 2026 Puja Vidhi, Muhurat And Moonrise Time Live Updates: पंचांग अनुसार करवा चौथ का पावन पर्व इस साल 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी दांपत्य जीवन के लिए निर्जला व्रत रहती हैं और रात में चंद्रमा के दर्शन करके अपना व्रत खोलती हैं। इस पावन अवसर पर व्रती महिलाओं के मन में पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, सरगी, कथा और चंद्रोदय के समय को लेकर कई सवाल रहते हैं। आइए इस लेख में इन सभी सवालों के सटीक और विस्तृत जवाब जानते हैं। जिससे आपकी करवा चौथ से जुड़ी सारी कन्फ्यूजन दूर हो जाएगी।

करवा चौथ पूजा का समय 2026

करवा चौथ पूजा का समय 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को शाम 05:38 बजे से शुरू होकर शाम 06:56 बजे तक रहेगा। वहीं करवा चौथ व्रत का समय सुबह 06:31 से शुरू होकर रात 08:17 बजे तक रहेगा। जब्कि चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर की रात 10:09 बजे तक रहेगी। तो वहीं पंचांग अनुसार करवा चौथ के दिन चंद्रमा के उदय होने का समय रात 8 बजकर 17 मिनट का है।

करवा चौथ की पूजा कैसे की जाती है?

अलग-अलग प्रान्तों में पूजन विधि व नियम में थोड़ा बहुत अंतर देखने को मिलता है इसलिए आपके यहां जिस भी परंपरा से पूजा होती है आप वैसे ही करें। लेकिन अगर आप करवा चौथ की पूजा पहली बार करने जा रही हैं या इसकी विधि सही से नहीं जानती हैं तो अब हम आपको इसकी सरल और लोकप्रिय विधि बताने जा रहे हैं। जो इस प्रकार है:

  • करवा चौथ की पूजा से पहले सभी जरूरी सामग्री एकत्रित कर लें। (करवा चौथ की सामग्री लिस्ट यहां देखें)
  • सुबह स्नान करने के बाद यह संकल्प बोलकर करवा चौथ का व्रत शुरू करें: फिर पूरे दिन निर्जला व्रत रखें।
  • इस व्रत की मुख्य पूजा शाम में की जाती है। पूजा का शुभ मुहूर्त आप ऊपर देख सकते हैं।
  • इस पूजन हेतु आपको पूजा के स्थान पर चौथ माता की एक फोटो रखनी है या फिर आप मार्केट से करवा चौथ का कैलेंडर भी खरीदकर ला सकती हैं। कई महिलाएं पूजा के लिए दीवार पर गेरू से माता का चित्र भी बनाती हैं।
  • सबसे पहले कलश की स्थापना की जाती है। कलश में सिक्का, सुपारी, हल्दी की गांठ, थोड़े अक्षत जरूर डालें।
  • कलश के ऊपर आम या अशोक के कुछ पत्ते रखें।
  • फिर कलश का मुंह किसी पात्र से ढक दें और उसके ऊपर थोड़े से अक्षत डालें। फिर कलश के ऊपर घी का दीपक रखें।
  • फिर एक करवा लेना है और उसमें जल भरें।
  • फिर करवे के छेद में 4 या 7 सींकें लगा दें। दरअसल कुछ परंपराओं में करवे की टोंटी में 7 सींक लगाई जाती है तो कुछ परंपराओं में 4 सींक लगाई जाती हैं।
  • फिर करवे के अंदर आप चांदी का सिक्का या अंगूठी भी जरूर डालें।
  • इसके बाद करवे को किसी चीज से ढक दें और उसके मुख पर कुछ मीठा रख दें। कई जगह करवे के मुख पर साबुत चावल रखे जाते हैं। ऐसे में आपके यहां जो परंपरा है आप उसी के अनुसार इस रस्म को निभाएं। बाद में इसी करवे से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। लेकिन कई जगह महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए एक अलग करवे का इस्तेमाल करती हैं।
  • एक करवा सास को देने के लिए तैयार किया जाता है। इसके लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लें या खांड का करवा भी ले सकती हैं। फिर करवे के अंदर खील, बताशे, मिठाई, गुलगुले, आदि चीजें भर लें। कई जगह इस करवे के अंदर गेहूं और इसके ढक्कन में शक्कर का बूरा भरा जाता है। साथ ही उसके ऊपर कुछ दक्षिणा रख दी जाती है।
  • इसके बाद धूप, दीप, चन्दन, रोली, सिन्दूर आदि से विधिवत पूजा की जाती है।
  • पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप अवश्य करें: नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभम्। हे भगवान शिव के सबसे प्रिय, भक्ति से संपन्न महिलाओं को आशीर्वाद दें
  • इसके बाद करवों का आदान प्रदान करना है। ध्यान रहे कि यह प्रक्रिया करत वक्त करवों को एक-दूसरे से टकराने नहीं देना है क्योंकि यह अपशगुन माना जाता है।
  • जो महिलाएं करवा चौथ की पूजा सामुहिक तौर पर न करके घर पर अकेले में करती हैं वो दो करवे भरती हैं एक अपने लिए और एक माता गौरी के लिए। इस दौरान आपको सात बार हाथ क्रॉस करके करवा बदलना है और करवा घुमाते समय ‘ले सुहागन ले करवा, दे सुहागन दे करवा’ कहना है। करवा चौथ पूजा के बाद इस करवे को सास को या घर की किसी बड़ी महिला को भेंट स्वरूप दे दिया जाता है।
  • पूजा के समय हाथ में अक्षत लेकर करवा चौथ की कथा भी जरूर सुनी जाती है। कथा के बाद भोग लगाकर करवा चौथ की आरती की जाती है।
  • फिर महिलाएं चंद्रमा की पूजा की तैयारी में लग जाती हैं। इस पूजा के लिए थाली में दीपक, बत्ती, रोली, अक्षत, फूल, मिठाई, करवा, जल और छलनी रखी जाती है। चंद्रमा के उदय होने के बाद छलनी में दीपक जलाकर जल से भरे पात्र से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। साथ ही चंद्र देव को फूल, रोली, अक्षत और मिठाई अर्पित की जाती है। फिर परिवार की परंपरा के अनुसार छलनी से चंद्रमा और फिर अपने पति का चेहरा देखकर व्रत का पारण कर लिया जाता है।

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