कोलोराडो विश्वविद्यालय के पर्वतीय भूगोलवेत्ता एल्टन बायर्स, जो अध्ययन में शामिल नहीं थे, का कहना है कि इसे अधिक प्रभावी पूर्व-चेतावनी प्रणाली और अन्य एहतियाती उपाय लाने के लिए “स्प्रिंगबोर्ड” के रूप में काम करना चाहिए।
लेकिन इसे हासिल करना एक चुनौती होगी. प्रचारकों का कहना है कि भवन निर्माण नियमों को ज़मीन पर लागू नहीं किया गया है और वर्षों से, कई स्थानों पर विकास अव्यवस्थित रहा है।
शहरी नियोजन विशेषज्ञ और नेपाल विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रोफेसर सूर्य राज आचार्य कहते हैं, सड़कों, जलविद्युत परियोजनाओं, होटलों और बाज़ार कस्बों का विस्तार नदियों के किनारे निचली, समतल भूमि पर हुआ है, जो सुलभ और निर्माण योग्य है।
उन्होंने आगे कहा कि जिम्मेदार लोगों ने अक्सर नदी तट से दूर रखने सहित सुरक्षा उपायों की अनदेखी की है।
“हिमालय जैसा नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र अन्य जगहों की तुलना में सख्त योजना और निर्माण नियमों की मांग करता है, फिर भी ये नियम कमजोर और खराब तरीके से लागू किए गए हैं।”
नेपाल में अधिकारियों का कहना है कि वे इन मुद्दों के समाधान के लिए काम कर रहे हैं। राष्ट्रीय आपदा एजेंसी के अनुसार, हाल ही में तबाह हुए रसुवा-भोटेकोशी गलियारे के साथ नदी तट के 15 मीटर (49 फीट) के भीतर बस्तियों पर जल्द ही प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इसी तरह के नियम जल्द ही अन्य नदी गलियारों में भी लागू किए जा रहे हैं।
मुख्य कार्यकारी धरम राज उप्रेती कहते हैं, ”यह एक चुनौतीपूर्ण काम है क्योंकि कई जगहों पर लोगों का अपनी जमीन और संपत्ति से भावनात्मक जुड़ाव होता है लेकिन हम बढ़ते जोखिमों को नजरअंदाज नहीं कर सकते।”


