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पुरुष ही क्यों करते हैं साष्टांग दंडवत प्रणाम? महिलाओं के लिए क्यों बताई गई अलग विधि, जानें धार्मिक वजह

Author: Ajay Kumar

Published: 07-10-2026, 1:39 PM

भारतीय संस्कृति में प्रणाम सम्मान, श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। पूजा-पाठ के दौरान भगवान के सामने दंडवत प्रणाम करने की भी परंपरा रही है। हालांकि, आपने अक्सर देखा होगा कि मंदिर या धार्मिक स्थलों पर महिलाएं पुरुषों की तरह जमीन पर पूरी तरह लेटकर साष्टांग दंडवत प्रणाम नहीं करतीं। इसके पीछे धार्मिक परंपरा और मान्यताओं से जुड़ी वजह बताई जाती है।

प्रणाम का धार्मिक महत्व

सनातन धर्म की परंपरा में भगवान, गुरु और बड़ों के सामने प्रणाम करना श्रद्धा व्यक्त करने का तरीका माना जाता है। पूजा पद्धति में दंडवत प्रणाम को भी विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता है कि इस तरह भगवान के सामने झुकने से व्यक्ति अपने अहंकार का त्याग करके पूरी तरह ईश्वर के प्रति समर्पित होता है।

क्या है साष्टांग प्रणाम?

साष्टांग यानी आठ अंगों से किया जाने वाला प्रणाम। इसमें व्यक्ति जमीन पर लेटकर भगवान के सामने अपना सिर झुकाता है। धार्मिक परंपरा में इससे जुड़े एक श्लोक में कहा गया है-

“पैरों, हाथों, घुटनों, छाती और सिर से।

मन, वाणी और दृष्टि से झुकना अष्टांगिक मार्ग कहलाता है।

इसका अर्थ है कि पैर, हाथ, घुटने, छाती, सिर, मन, वाणी और दृष्टि के जरिए किया गया प्रणाम अष्टांग नमस्कार कहलाता है। इसे भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव माना जाता है।

इस विषय में धर्मसिंधु से संबंधित बताए जाने वाले एक श्लोक का भी उल्लेख किया जाता है-

“ब्राह्मण का गुदा शंख और शालिग्राम की पुस्तक है।
पृथ्वी सुन्दर स्तनों का कुचलना सहन नहीं कर सकती।

इससे जुड़ी व्याख्या में महिलाओं के वक्षस्थल को भूमि से स्पर्श कराने से बचने की बात कही जाती है।

महिलाओं के लिए क्यों है अलग मान्यता

महिलाओं के साष्टांग प्रणाम को लेकर कुछ अलग मान्यताएं मिलती हैं। इसके अनुसार, इस तरह प्रणाम करने में महिला के पेट और वक्षस्थल का भूमि से स्पर्श हो सकता है। धार्मिक मान्यताओं में महिला के गर्भ और वक्ष को सृष्टि और मातृत्व से जुड़ा पवित्र अंग माना गया है। इसी वजह से महिलाओं को जमीन पर दंडवत प्रणाम करने की मनाही बताई जाती है।

महिलाएं कैसे करें प्रणाम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महिलाएं घुटनों के बल बैठकर, सिर झुकाकर या हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम कर सकती हैं। इसे भी श्रद्धा और समर्पण का ही भाव माना जाता है। यहां मुख्य बात प्रणाम की मुद्रा से अधिक मन में मौजूद श्रद्धा और विनम्रता को माना गया है।

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।)

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