केंद्र ने एक राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से सस्ती दरों पर ऑन्कोलॉजी उपचारों की बिक्री की अनुमति देने के लिए अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30 प्रतिशत पर 137 गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं के व्यापार मार्जिन कैप को अंतिम रूप दिया है।
राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के एक बयान के अनुसार, सूची में स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) के तहत एक विशेषज्ञ समिति (ईसी) द्वारा अनुशंसित सूची के आधार पर पेटेंट और गैर-पेटेंट दोनों दवाएं शामिल होंगी।
17 अक्टूबर की एक राजपत्र अधिसूचना के अनुसार, व्यापार मार्जिन-कैप्ड कैंसर दवाओं की सूची में निवोलुमैब, ओलापारिब, डेनोसुमैब और टोपोटेकन शामिल हैं। हालाँकि, इस कदम से दवा निर्माताओं द्वारा व्यक्तिगत रोगियों के लिए चलाए जाने वाले रोगी सहायता कार्यक्रम (पीएपी) के तहत आपूर्ति की जाने वाली दवा की मात्रा बाहर हो जाएगी।
एनपीपीए ने कहा कि सूची को समय-समय पर अद्यतन किया जाएगा, जिसमें व्यापार मार्जिन को औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश (डीपीसीओ), 2013 के पैराग्राफ 19 के तहत शामिल किया जाएगा।
पैराग्राफ 19 एनपीपीए को असाधारण परिस्थितियों में और सार्वजनिक हित में किसी भी दवा की अधिकतम और खुदरा कीमतों को संशोधित या तय करने की अनुमति देता है।
16 अक्टूबर को हुई 284वीं एनपीपीए बैठक के मिनट्स में कहा गया, “प्राधिकरण ने अत्यधिक मार्क-अप को रोकते हुए उचित व्यापार मार्जिन बनाए रखने के लिए, जीएसटी को छोड़कर, स्टॉकिस्ट/डिस्ट्रीब्यूटर को कीमत (पीटीएस/पीटीडी) पर 42.86 प्रतिशत के मार्क-अप के अनुरूप व्यापार मार्जिन को एमआरपी के 30 प्रतिशत पर सीमित करना आवश्यक समझा।”
एनपीपीए के हस्तक्षेप से पहचानी गई गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमतों (एमआरपी) में उनकी मौजूदा मूल्य संरचनाओं के आधार पर 70 प्रतिशत तक की कमी आने और 2,500 करोड़ रुपये की अनुमानित वार्षिक बचत होने की उम्मीद है।
संशोधित कीमतें 9 नवंबर, 2026 से प्रभावी होंगी। मामले से अवगत अधिकारियों ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, “निर्माताओं को अपनी वेबसाइट पर मूल्य सूची प्रदर्शित करने और सभी खुदरा विक्रेताओं और अस्पतालों में व्यापक रूप से प्रसारित करने की आवश्यकता होगी।”
उन्होंने कहा कि सभी निर्माताओं को राजपत्र अधिसूचना के प्रकाशन के सात दिनों के भीतर अपनी संशोधित कीमतों के बारे में एनपीपीए को सूचित करना होगा।
17 अक्टूबर की एक राजपत्र अधिसूचना में कहा गया है, “चूंकि कैंसर रोधी दवाओं की पर्याप्त आपूर्ति सीधे अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को की जाती है, इसलिए उन्हें फॉर्मूलेशन की एमआरपी की निगरानी करना और अनुपालन सुनिश्चित करना आवश्यक है।”
इसमें कहा गया है कि राज्य दवा नियंत्रकों को खुदरा विक्रेताओं, अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों सहित निर्माताओं और डीलरों द्वारा अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
इसी प्रकार, फार्मास्युटिकल कंपनियों को रोगियों के लिए समय पर और निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करने के लिए अधिसूचित फॉर्मूलेशन के लिए वर्तमान उत्पादन और आपूर्ति स्तर को बनाए रखने की आवश्यकता होगी।
अधिसूचना में कहा गया है, “इस आदेश के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करने वाले निर्माता आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के साथ पढ़े गए डीपीसीओ 2013 के प्रावधानों के तहत ब्याज के साथ अधिक वसूली गई राशि जमा करने के लिए उत्तरदायी होंगे।”
अधिकारियों ने पहले बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया था कि ईसी ने विभिन्न दुकानों पर गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं के लिए 170 से 700 प्रतिशत तक व्यापार मार्जिन पाया था।
गैर-अनुसूचित दवाएं फार्मास्युटिकल फॉर्मूलेशन हैं जो ड्रग्स (मूल्य नियंत्रण) आदेश (डीपीसीओ), 2013 के तहत मूल्य सीमा के अधीन नहीं हैं। ऐसे फॉर्मूलेशन और उपकरणों के निर्माता 12 महीने की अवधि में कीमतों में 10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर सकते हैं। भारत के घरेलू दवा बाज़ार में इन दवाओं की हिस्सेदारी अनुमानित 82 प्रतिशत है।
यह निर्णय व्यापार मार्जिन युक्तिकरण (टीएमआर) की दिशा में पहला कदम है, भले ही फार्मास्यूटिकल्स विभाग (डीओपी) और एनपीपीए आवश्यक दवाओं के लिए मूल्य मार्क-अप पर उद्योग परामर्श आयोजित करते हैं।
टीएमआर के तहत, किसी निर्माता द्वारा वितरक से ली जाने वाली कीमत और उपभोक्ता द्वारा भुगतान की गई कीमत के बीच के अंतर को पारंपरिक मूल्य नियंत्रण के विपरीत नियंत्रित किया जा सकता है, जो किसी फॉर्मूलेशन के लिए अधिकतम कीमत तय करता है।
केंद्र ने पहले 2019 में 42 कैंसर दवाओं के लिए व्यापार मार्जिन को सीमित कर दिया था, जिसके परिणामस्वरूप 526 ब्रांडों में 984 करोड़ रुपये की वार्षिक बचत हुई थी।
अधिकारियों ने कहा कि मार्जिन कैपिंग को अंततः कैंसर की दवाओं से आगे अन्य गैर-अनुसूचित फॉर्मूलेशन, चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों और अंतःशिरा (IV) किट और कैथेटर जैसे उपकरणों तक बढ़ाया जा सकता है।
आवश्यक दवाओं पर उच्च मार्क-अप की सुप्रीम कोर्ट की जांच के बीच यह कदम भी उठाया गया है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने डीपीसीओ के तहत अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाओं के बीच नियामक अंतर पर सवाल उठाया है और क्या गैर-आवश्यक के रूप में वर्गीकृत दवाओं को मूल्य नियंत्रण तंत्र से बाहर रहना चाहिए।


