सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) द्वारा राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के प्रशासन में हस्तक्षेप करने पर चिंता व्यक्त की और कहा कि उसके कार्य न्यायाधिकरण की स्वायत्तता को कमजोर कर रहे हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की खंडपीठ ने देश भर में एनसीएलटी पीठों में कर्मचारियों की कमी, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक कठिनाइयों से संबंधित एक स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
अदालत ने मौखिक रूप से कहा, “हम यह देखने के लिए मजबूर हैं कि इसे एमसीए ने पूरी तरह से हाईजैक कर लिया है। यही समस्या है। और यह संस्थान की स्वायत्तता में बाधा डाल रहा है।”
बेंच ने कहा कि मंत्रालय ट्रिब्यूनल पर पूर्ण नियंत्रण रखने के लिए प्रतिबद्ध प्रतीत होता है। अदालत ने कहा, “मंत्रालय संस्थान पर पूरी पकड़ बनाना चाहता है। और यही सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है।”
एनसीएलटी में कर्मचारियों की भर्ती की आउटसोर्सिंग एक निजी कंपनी को करने को चुनौती देने वाली एक संबंधित याचिका की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां आईं। मामले में पेश हुए वकील ने कहा कि मंत्रालय ने 6 अक्टूबर को भारत में काम करने वाली एक विदेशी कंपनी को डिप्टी रजिस्ट्रार, सहायक रजिस्ट्रार और स्टेनोग्राफर सहित प्रशासनिक कर्मचारी उपलब्ध कराने का ठेका दिया था। इस व्यवस्था के परिणामस्वरूप मौजूदा संविदा कर्मचारी 1 या 2 नवंबर से विस्थापित हो सकते हैं।
अदालत ने कर्मचारियों को केवल उनकी सेवा अवधि के आधार पर अंतरिम सुरक्षा देने से इनकार कर दिया। इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि नियुक्ति की शक्तियां ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष के पास होनी चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की, “हम आपके लोगों को बने रहने नहीं देंगे, हम इन निजी ठेकेदारों को बने रहने नहीं देंगे। संदर्भ एनसीएलटी अध्यक्ष की ओर से आने दीजिए। नियुक्ति की पूरी शक्ति केवल अध्यक्ष के पास होनी चाहिए।”
खंडपीठ ने यह भी सवाल किया कि क्या जिन संविदा कर्मचारियों की प्रतिस्पर्धी भर्ती नहीं हुई है, वे नियमितीकरण या सेवा में बने रहने के अधिकार का दावा कर सकते हैं। इसमें उन उदाहरणों का उल्लेख किया गया है जिनमें कथित तौर पर न्यायिक रिकॉर्ड हटा दिए गए थे और कुछ संविदा कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे।
अदालत ने सुझाव दिया कि अनुभवी सरकारी अधिकारियों को शुरू में प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त किया जा सकता है, उसके बाद चरणबद्ध प्रक्रिया के माध्यम से भर्ती की जा सकती है।
पीठ को सूचित किया गया कि एनसीएलटी के 320 स्वीकृत नियमित प्रशासनिक पदों में से केवल 67 ही भरे गए हैं, जिससे 253 रिक्तियां रह गई हैं। यह भी बताया गया कि न्यायिक एवं तकनीकी सदस्यों में 16 पद रिक्त हैं.
एनसीएलटी बार एसोसिएशन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील संजीव सेन ने दिल्ली में ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ की बिगड़ती स्थिति पर प्रकाश डाला। सेन ने कहा, “छतें ढह रही हैं, मुख्य पीठ की आठवीं मंजिल को बंद कर दिया गया है, सातवीं मंजिल को बंद कर दिया गया है, दो मंजिलों को बंद कर दिया गया है। सभी अदालतें आधी क्षमता पर काम कर रही हैं। यह जर्जर स्थिति में है।”
केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि नियुक्ति की सिफारिशें पाइपलाइन में हैं और उन्होंने सरकार, एनसीएलटी अध्यक्ष और बार प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक संयुक्त बैठक का प्रस्ताव रखा।
बेंच ने एनसीएलटी और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) के अध्यक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपने बुनियादी ढांचे, स्टाफिंग और प्रशासनिक आवश्यकताओं का विवरण देने वाले प्रस्ताव प्रस्तुत करने को कहा। इसने केंद्र सरकार से न्यायाधिकरणों को जल्द से जल्द बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने का भी आग्रह किया। अदालत ने कहा, “अब हमें ऐसा लगता है कि इस मामले में हमारी सहायता के लिए सबसे उपयुक्त प्राधिकारी एनसीएलटी और एनसीएलएटी के विद्वान अध्यक्ष होंगे।”
बेंच ने कंपनी अधिनियम के तहत मामलों में देरी को भी चिह्नित किया, यह देखते हुए कि दिवाला कार्यवाही को प्राथमिकता मिल रही है। इसने आउटसोर्स भर्ती को चुनौती देने वाली याचिका में नोटिस जारी करते हुए कहा कि व्यापक जनहित में इस मुद्दे की जांच की जाएगी।


